मंदिर की पहली पूजा और मस्जिद की पहली अजान है तू , कैसे कहु मेरी जान है तू
नहीं मिलूंगी तुम्हें किसी मजार और कब्र में, इसलिए ये उम्र मत गुजारो सब्र मे
अपना घर तो अपना घर होता है जहा सोने का हर पहर होता है
आज भी वो प्यार की लो जलती है उनके करीब आने से ही होठो की प्यास बुझती है
जिन्होने किया है बेहाल आज वो ही मेरा हाल पूछ रहे हैं
भले उनकी कातिल अदा से लगता है डर, फिर भी ये धड़कन उन्हे देख के जाति है मर
कुछ बनने की कभी मत बुझने दो प्यास
आँखे दुखती है फिर भी हर पल आसमान में उड़ने का सपना देखती है
प्यार वो खिताब है जिसे पाने के लिए तरश्ते अच्छे - अच्छे नवाब ने
मेरा हर अरमान खिल उठता है जब तु मिलता है
तेरी इस प्यारी सी नजाकत में भी कातिलाना ताकत छिपी है
आँखे आज भी रोती है जब उस बेवफा की बेवफाई को याद करती है
सादगी जीवन की वो अदा है जिसका ये दुनिया मान करती सदा है
अनुभव होता बड़ा गुरु है इसी से होती वास्तविक जिन्दगी शुरु है
जीन बच्चों को मा - बाप सिखाते हैं जीने का ढंग, वो हो बच्चे बुढापे मे मा - बाप को बोलते हैं मत करो तंग
दुखों की आती जब धूप है, तब लब हो जाते चुप है
चलो सो जाते हैं एक राजकुमार के सपनो में खो जाते हैं
जिन्हे कुछ नहीं आता है , उन्हे ही घमंड रहता है
जब तक सही रहोगे, तब तक भक्ति के पावन धारा में बहोगे
आज भी सुबकती हू किसी कोने मे छिप के रोती हू
जब आएगा तुम मे घमंड, तब मिलेगा तुम्हें तन्हाई का दंड